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दुख और चिंता दूर करने का सरल उपाय : Stress Management

सुख और दुःख में क्या अंतर है ?

संसार में सुख सभी चाहते हैं और दुःख कोई भी नहीं चाहता , जबकि दाेनों ही एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरे की महत्ता को अनुभव नहीं किया जा सकता। सच्चाई तो यह है कि कोई भी मनुष्य संपूर्ण रूप से ना तो सुखी है अौर ना ही दुखी। अब प्रश्न उठता है कि यदि एक साथ हम किसी बात पर सुखी है और किसी अन्य बात पर दुखी तो फिर यह निष्कर्ष निकलता है कि समस्या का कारण भी हम है और निदान भी। अर्थात , सुख और दुख की अनुभूति नितांत वैयक्तिक है। जिस बात पर एक सुखी हो रहा होता है तो उसी बात पर एक दुखी। अतः यदि अपने मन को सही ढ़ंग से संचालित किया जाय तो दुख की निवृत्ति तात्कालिक प्रभाव से हो सकता है।


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Stress Management


हमें अपने मन को मनाना होगा:

जब यह तय है कि ' मन के माने हार है , मन के माने जीत' तो क्यों ना मन को ही ऐसी दिशा दिया जाय जिससे हम सदा सुखी रहें। सबसे बड़ी समस्या हम समस्त  मानव के साथ यह है कि हम समाधान हमेशा अपने से बाहर देखते हैं। हमें ऐसा लगता है कि कोई ऐसा ' अलादीन का चिराग ' हाथ लग जाए जो तत्क्षण दुख का निवारण कर दे । कोई तांत्रिक , बाबा , पीर या महापुरुष मिल जाए जिसके एक आशीर्वाद से हमारी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाए। और इस इस प्रकार से हम तमाम तरह के अन्य कर्मकांडो में लिप्त हो जाते हैं जो अंततः हमें अन्य तरह की समस्याओं में उलझा देते है और मूल समस्या वहीं की वहीं रह जाती है।
हमारे मनीषियों नें हमें बताया है कि ' जिन ढूँढा तिन पाईयां , गहरी पानी पैठ '। दरअसल , हम जिस किसी भी धर्म के मानने वाले हैं वह हमें जीने की राह ही दिखलाते हैं । वस्तुतः सभी धर्मों के प्रवर्तकों ने एक ही सच को केंद्र में रखकर जीवन के सभी समस्याओं का समाधान देने का प्रयास किया है। मसलन:

1) सनातन धर्म: ' सत्य ' की नीवं पर टिका है।
2) इस्लाम धर्म : ' निष्ठा ' की नीवं पर
3) ईसाई  धर्म  : ' प्रेम ' को मूल में रखा है।
4) बौद्ध  धर्म   : ' करूणा ' को तो
5) जैन  धर्म।   : ' त्याग ' को आधार मानकर अपने को विस्तार दिया है।

दु:खो  का मूल कारण और उसका वर्गीकरण : 


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इसी प्रकार यदि हम अपने दुखों के कारण को परिभाषित कर यदि किसी एक विचार को समाधान का औजार बना ले तो दुख की निवृत्ति में अधिक सहयोगी साबित होगा। दुख के भी कई कारण हो सकते हैं लेकिन मूलतः इसे तीन वर्गों में रखा गया है :
1) अभाव का दुख
2) प्रभाव का दुख
3) शारीरिक बीमारियों का दुख

इन तीनों दुःखो का निवारण कैसे करे:

1) अभाव का दुख :

 यदि हमें कर्म पर विश्वास है तो हम समुचित कर्म कर के अभाव को दूर कर सकते हैं । धन नहीं है तो व्यवसाय, नौकरी या फिर जिस कर्म में हम अभी लगे हुए हैं उसमें अधिकाधिक मेहनत करके धन की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है । और इस प्रकार से हम अपने अभाव के दुख को दूर कर सकते हैं।
अभाव का कोई अंत नहीं है। दुनिया में ज्यादातर लोगों को किसी न किसी चीज का अभाव है, लेकिन अपने अभावों से निराश होने से अच्छा है , हमारे पास जो भी उपलब्ध है उसी में खुश रहने की कोशिश करें। बहुत से लोगो की आदत होती है की वो अपने से अधिक संपन्न लोगो को देखकर हमेशा ये सोचते है की वो कितने खुसनसीब है, भगवान ने उन्हें सब कुछ दिया है, इन्हे किसी भी चीज का कोई आभाव नहीं है। लकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है। भले ही वे लोग हमसे अधिक संपन्न है लकिन उनके पास भी कुछ न कुछ अभाव अवश्य होता है। हमारे पास जो कुछ भी है उसके लिये हमे हमेशा ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए , क्योकि उन्होंने हमे जो कुछ भी दिया है , दुनिया में बहुत से लोग ऐसे भी है जिनके के पास उतना भी नहीं है।

2) प्रभाव का दुख :

 प्रभाव से उत्पन्न दुख का निवारण थोड़ा कठिन होता है क्योकि इसमें अभाव के उलट उपलब्धता से कष्ट होता है। मसलन, पुत्र है लेकिन वो लायक नहीं बना या फिर कुपुत्र हो गया। ऐसी स्थिति में  फिर अपने मन को ही संयमित कर उस स्थिति को  सुधारने का प्रयास किया जा सकता है ।अर्थात , स्थिति को सुधारने का प्रयास करते हुए सच्चाई को सही रूप से स्वीकारना ही इसका समाधान हो सकता है।

3) शारीरिक बीमारियों का दुख :

 शारीरिक व्याधि से छुटकारा यदि शिक्षित और अनुभवी डॉक्टर भी दिलाने में अक्षम साबित हो रहा है तो इसे शरीर की व्याधि समझ कर अपने को इससे अलग कर लेना चाहिए। यदि मेडिकल साइन्स के 'रोग निवारण ' संकल्पना पर ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाता है कि औषधि का निर्माण यह ध्यान में रखकर किया जाता है कि रोगी को उसके शारीरिक क्षमता के अनुरुप  कम या अधिक शक्ति की औषधि दी जाए। इसी प्रकार हम अपने को नियति की इच्छा मानकर इसे दर्शनात्मक दृष्टि देकर रोग से छुटकारा पा सकते हैं।


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सर्वोपरि बात यह है कि यदि हम अपने को सभी कारणों का समाधान का यंत्र समझ रखे हैं अर्थात हमारे अंदर अगर कर्ता का भाव है तो हमें दुखी रहना ही पड़ेगा।यदि हम अपने को रंगमंच के एक अभिनेता के रूप में देखें जिसे एक अमूक रोल करना है और यादि हम केवल अपने रोल पर ध्यान केंद्रित रखे तो दुख का कोई कारण नहीं बनेगा। दूसरों से अपनी तुलना या दूसरों के जीवन में ताक- झाक हमें अंततः दुखी करते है।

अंततः जीवन हमें जिस रुप में मिले उसे उसी रुप में स्वीकारना और पॉजिटिव सोच से हमेशा अनुकूल परिस्थिति को बनाए रखना, दुख निवारण का एकमात्र उपाय है। जो होकर रहना है उससे दुखी क्यों होना। जो हमारे बस में ही नहीं है उससे दुख करना कोई बुद्धिमता नहीं है। ठीक इसी प्रकार जो नहीं होना है उससे भय खाकर दुखी होना भी कायरतापूर्ण है। जीवन में जो भी आए उसे उसी रुप में स्वीकार कर अपनी उपलब्ध सीमाओं का समुचित आकलन और तदुनूकुल समाधान हम कर सकते हैं और इस प्रकार अपने जीवन को सुखी और पूर्ण साधन - संपन्न बना सकते हैं।




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