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गणेश चतुर्थी: व्रत,कथा और महत्व | Ganesh Chaturthi : Vrat, Katha aur Mahatva In Hindi

गणेश चतुर्थी : व्रत , कथा और  महत्व 

गणेश चतुर्थी का त्योंहार हिंदुओं के प्रमुख त्योंहारो में से एक है। गणेश चतुर्थी का यह  महापर्व महाराष्ट्र समेत भारत के सभी राज्यों में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्योंहार गणेश चतुर्थी के साथ-साथ  विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता हैं। गणेश चतुर्थी का त्योंहार प्रथम पूज्य श्री गणेश जी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। हिदूं कैलेंडर के अनुसार, यह त्योंहार  हर साल भाद्रपद महीने में आता है।यह त्योंहार शुक्ल चर्तुर्थी (चौथा चंद्र दिवस) से शुरू होकर अनंत चर्तुदशी (चौदहवे चंद्र दिवस) पर समाप्त होती है।
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गणेश चतुर्थी 2018:मूर्ति स्थापना और पूजा का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष गणेश चतुर्थी का पर्व 13 सितम्बर से 23 सितंबर तक मनाया जाएगा।
13 सितंबर गणेश पूजा का समय : 11:03 से 13:30 तक

गणेश विर्सजन मुहूर्त 2018:

इस वर्ष अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन का मुहूर्त सुबह 9:12 पर शुरू होकर देपहर में 1:54 पर समाप्त होगा।विसर्जन की अवधि 4 घंटे और 40 मिनट की है।

गणेश चतुर्थी का महत्व :

पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश का आर्विभाव हुआ था। भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में यह त्योंहार बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। श्री गणेश जी को भक्त कई नामों से पूजते है जैसे: प्रथम पूज्य श्री गणेश, विध्नहर्ता श्री गणेश,गजानन,एकदंत,विनायक, लंबोदर इत्यादि।
श्री गणेश को भक्त भले ही अलग अलग नामों से पूजते हैं लेकिन उनकी अराधना के समय भक्तों के मन में बस एक ही आस रहती है कि उनपर और उनके पूरे परिवार पर श्री गणेश जी की कृपा हमेशा बनी रहे । गणेश  चतुर्थी पर सच्ची श्रद्धा और भक्ति से किए गये आराधना से गणेश जी शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनवांछित फल प्रदान करते हैं । वे अपने भक्तों के जीवन से सभी विध्न - बाधाओं को दूर करते हैं और सुख -संपत्ति और सौभाग्य प्रदान करते है।

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गणेश उत्सव की तैयारी:

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हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक गणेश चतुर्थी की तैयारी लोग कहीं महीनें पहले से ही शुरु कर देते हैं। कुशल मूर्तिकार गणेश जी की सुंदर मूर्तियाँ बनाने का कार्य बहुत पहले ही शुरु कर देते हैं। गणेश चतुर्थी पर लोग घर के लिए तथा सार्वजनिक पंडालों के लिए भगवान गणेश की मिट्टी से बनी मूर्ति लाकर उन्हें स्थापित करते हैं। इसके बाद पूरे विधि- विधान के साथ गणेश जी की पूजा- अर्चना की जाती हैं। घरों मे लोग गणेश जी को भोग लगाने के लिए विभिन्न तरह के पकवान और मिठाइयां बनाते है जैसे- करंजी, मालपुआ, हलुआ, खीर, लड्डू और मोदक इत्यादि।
घरों में लोग मूर्ति रखने के स्थान को बहुत ही सुंदर तरीके से सजाते है। सार्वजनिक पंडालो में तो सजावट का कार्य महीनें पहले से ही शुरू हो जाता है। फिर गणेश चतुर्थी के दिन लोग सवेरे जल्दी उठकर,नहा-धोकर, बैंड बाजे के साथ गणेश प्रतिमा लाने जाते है और फिर मूर्ति लाकर उनकी घरो और पंडालो में स्थापना की जाती है।स्थापना के पश्चात पूरे नियमों के साथ गणेश जी की पूर्जा अर्चना की जाती है।
पूरे गणेश उत्सव के दौरान हर तरफ खुशी का माहौल रहता है। सारे भक्त भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए अपनी शक्ति के अनुसार फल,फूल,नारीयल, लड्डू और मोदक का प्रसाद चढ़ाते हैं ।कई भक्त तो पूरे दिन गणेश चतुर्थी का व्रत रखते हैं और प्रभू गणेश की आराधना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि पहले व्यक्ति जिन्होंने गणेश चतुर्थी का उपवास रखा था वे चंद्रमा थे।
एक बार गणेश जी स्वर्ग की यात्रा करते समय चंद्रमा से मिले। चंद्रमा को अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड था वे  गणेशजी की भिन्न आकृति को देखकर हँसने लगे।  तब  गणेश जी ने उन्हें क्रोधित होकर श्राप दे दिया । चंद्रमा को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तब वे गणेश जी से माफी मांगने लगे और उन्हें श्राप मुक्त कराने का अनुरोध करने लगे ।
अंत में भगवान श्री गणेश ने उन्हें श्राप से मुक्ति के लिए पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ गणेश चतुर्थी का व्रत रखने की सलाह दी।

मूर्ति विर्सजन:

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गणेश चतुर्थी पर मूर्ति स्थापना डेढ़ दिन से लेकर 3,5,7,10 और 11 दिनों तक की होती है । इसके बाद इन दिनों के अंतराल पर लोग गणेश प्रतिमा को जल में ले जाकर र्विसर्जित कर देते हैं और उनसे अगले बरस फिर जल्दी से आने की प्रार्थना करते हैं । गणेश चतुर्थी के त्योंहार में ग्याहरवें दिन मनाए जाने वाले गणेश विसर्जन के अनुष्ठान को अनंत चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है।

गणेश चतुर्थी की कथा:

कथानुसार,प्राचीन समय में, एक बार भगवान शिव हिमालय के पहाड़ों में समाधि के लिए चले गए।तब पार्वती माता कैलाश पर अकेली थी ।तब उन्होंने स्नान करने से पूर्व एक शक्तिशाली बालक  का निर्माण करने के बारे में सोचा। अपने शरीर में लगे चंदन के लेप से उन्होंने सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उस बालक का नाम गणेश रखा ।फिर उन्होंने उस बालक को दरवाजे पर पहरा देने का आदेश देते हुए किसी को भी अंदर न आने देने की आज्ञा दी। थोड़ी देर बाद जब भगवान शिव वापस आए और द्वार के अंदर प्रवेश करने लगे तब बालक गणेश ने उन्हें वहीं रोक दिया। शिव जी के बुहत समझाने पर भी जब गणेश नहीं माने तब शिवजी अत्यंत क्रोधित हो गए। क्रोध में आकर भगवान शिव ने  अपने त्रिशूल से बालक गणेश का सिर ,धड़ से अलग कर दिया।
वापस आने पर जब माता पार्वती ने बालक  गणेश का कटा सिर  देखा तो वे अत्यंत क्रोधित हो गई ।उनके क्रोध को देखकर सभी देवी- देवता ने माता की स्तुति कर उनको शांत किया और भोलेनाथ से बालक गणेश को जीवित करने का अनुरोध किया।
भगवान शिव ने अपने अनुयायी गणों से किसी भी ऐसे का सिर लाने के लिए कहा जो उत्तर दिशा की तरफ मुंह करके और अपने बच्चे से विपरीत दिशा में सो रहा हो। बहुत तलाशने के बाद उन्हें एक बच्चे के विपरीत उत्तर दिशा में सोते हुआ एक हाथी मिला जिसका सिर काट कर कैलाश पर लाया गया। फिर इस हाथी के सिर को भगवान शिव ने गणेश जी के धड़ के साथ जोड़कर उन्हें पुनः जीवित कर दिया।फिर भगवान शिव, ब्रहमा,विष्णु, इंद्र और सभी देवी -देवताओं द्वारा गणेश जी को प्रथम पूज्य होने के आशीर्वाद के साथ- साथ विभिन्न शक्तियां औरत अस्त्र -शस्त्र प्रदान किया।

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गणेश भगवानों के भगवान है। भगवान गणेश एक तरफ अपने भक्तो और देवताओं के लिए विघ्नहर्ता अर्थात समस्त  बाधाओं और कष्टों को दूर करने वाले हैं, तो वही दूसरे तरफ वे राक्षसों और बुरी प्रवृत्तियों वाले लोगों  के लिए विघ्नकर्ता अर्थात बाधा- निर्माता है।इसीलिए अगर हम सब सच्चे मन,पूरी निष्ठा और श्रद्धा भाव के साथ गणेशजी की उपासना करेगें तो हमें भी उनकी कृपा दृष्टि अवश्य ही प्राप्त होगी ।इसीलिए ,आइए उनके इस मंत्र का उच्चारण करते हुए गणेश जी को प्रणाम करे!

वक्रतुण्ड  महाकायं,  सूर्यकोटि  समप्रभा ।

निर्विघ्रं  कुरूमेदेवं   सर्व  कार्येषु   सर्वदा  ।।





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