Header Ads

सावन का महीना और शिव महिमा : Sawan Ka Mahina aur Shiv Mahima

सावन के महीने की महिमा:


सावन के महीने का संबंध पूरी तरह से शिवजी से माना जाता है ।पुुराणों के अनुुसार सावन का महीना  भगवान शिव की अराधना केे लि सबसे उपयुक्त महीना है। भोलेनाथ की अराधना , साधना, तपस्या और उनकी वरदान प्राप्ति के लिए   यह महीना अत्यंत शुभ माना जाता है। सावन के महीने मे हम इंंसान क्या, जैसे सारी प्रकृति ही 'शिवमय' हो जाती है। चारो तरफ से जैसे 'ॐ नमः शिवाय ', 'बम बम भोले ', 'हर-हर महादेव' की गूँज सुनाई देती है।हम पूरे साल भर भगवान शिव की पूजा करके जो फल पाते हैं वह केवल एक सावन के महीने में पूजा करके पाया जा सकता  हैं । सावन के इस महीने में भगवान भोलेनाथ की पूजा करके हम उनसे मनचाहा वरदान पा सकते है।पौराणिक कथाओं के अनुसार ,सावन के महीने मेे संपूर्ण सृृष्टी का संंचालन शिव जी के उग्र  रूप रुद्र के हाथों द्वारा  होता हैं। इस महीने मे ही देवताओं और दैत्यों द्वारा मिलकर समुद्र मंथन किया गया था।

समुद्र मंथन:

एक तरफ देवराज इन्द्र, दुर्वासा ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण शक्तिहीन हो गए थे और दूसरी तरफ दैत्यराज बलि का राज तीनों लोकों पर स्थापित हो गया था। उसके राज्य में दैत्य,दानव और असुर सभी प्रबल थे। देवराज इन्द्र सहित देवतागण भी दैत्यराज से भयभीत रहते थे। इस समस्या को लेकर जब सभी देवतागण भगवान विष्णु के पास पहुँचे तो उन्होनें देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र मंथन का उपाय सुझाया ताकि इसके फलस्वरूप निकले हुए अमृत को देवतागण पीकर अमर हो जाये और उनमें दैत्यों को मारने का सामर्थ्य आ जाये।

भगवान शंकर को नीलकण्ठ क्यों कहा जाता है ?

भगवान विष्णु के आदेशानुसार जब समुद्र मंथन शुरू हुआ तब सबसे पहले उसमें से हलाहल (कालकूट) विष निकला।इस विष की ज्वाला इतनी प्रचंड थी की सभी देवता तथा दैत्य इसकी ज्वाला से जलने लगे और उनकी कान्ति फीकी पड़ने लगी। हलाहल विष से अपनी तथा पूरे विश्व की रक्षा हो सके इसीलिए सभी ने मिलकर भगवान शंकर से सहायता करने की प्रार्थना की।
भगवान शंकर ने उस विष से पूरी सृष्टि की रक्षा करने के लिए उस विष को हथेली पर रख विषपान कर लिया,लेकिन उन्होनें उस विष को कंठ में ही रखा उसे नीचे नही उतरने दिया। हलाहल विष के प्रभाव से भगवान शंकर का कंठ नीला पड़ गया,इसीलिए उस दिन स उन्हें 'नीलकंठ' भी कहा जाने लगा।भगवान शंकर जब हथेली पर रखकर हलाहल विष पी रहे थे उसी समय विष की कुछ बूंदे धरती पर गिर गयी थी जिसका अंश हमें आज भी साँप ,बिच्छू और जहरीले कीड़ो में दिखाई देता है।

सावन के महीने मे शिवलिंग पर जल क्यों अर्पित किया जाता है?

सावन के महीने में ही समुद्र मंथन हुआ था और इसमें से निकले हलाहल विष का पान भी भगवान शंकर ने इसी महीने मे किया था। 
हलाहल विष इतना ज्यादा उग्र विष था कि भगवान शंकर ने उसे अपने कंठ में ही रोके रखा,लेकिन विष की उग्रता उनके अंदर तब भी बनी रही।विष के प्रभाव को दूर करने केे लिए सभी  देेवताओं ने उनका जलाभिषेक किया,और तभी से यह परंपरा चली आ रही है। सावन में शिव जी को जल अर्पित करने के लिए मंदिरो में भक्तो का तांता लगा रहता है। सावन के पवित्र महीने में ही कांवर यात्री भी पवित्र नदियों से जल भर लाते है और शिवलिंग का जलाभिषेक करते है। शिवलिंग
 पर जल चढ़ाकर  हम भगवान को अपना आभार व्यक्त करते है कि इस उग्र विष का पान कर उन्होनें हम सब को जीवनदान दिया है।

    सावन के महीने की कुछ विशेष सावधानियाँ :

  • इस महीने मे जल की बर्बादी ना करे , जहा तक हो सके जल का संरक्षण करे। 
  • इस महीने मे तेज धूप मे जाने से बचें। 
  • सावन मे अपने आँखों का विशेष ध्यान रखे , इस समय 'आँख आना' जैसा सक्रमण बड़ी तेजी से फैलता है। 
  • सावन मे अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखे। 
  • इस महीने मे बैंगन , दूध और हरी सब्जियों से परहेज करे। 
  • सावन के महीने मे मांसाहार और तामसिक चीजों से दूरी बनाएं। 

No comments