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श्रीकृष्ण जनमाष्टमी 2018 तिथि, मुहूर्त और महत्व | Krishna Janmashtami 2018 Date,Muhurat and Mahatva In Hindi

श्री कृष्ण जन्माष्टमी:

जन्माष्टमी पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के रुप में मनाया जाता है ।यह पर्व भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विश्व के बहुत से देशों में  पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण भारत देश के लोगों के साथ- साथ विदेशों में बसे लोगों के लिए भी श्रद्धा और आस्था का केंद्र हैं। उनके भक्त पूरे विश्व में फैले हुए हैं।

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श्री कृष्ण जन्माष्टमी 

श्री कृष्ण जनमाष्टमी 2018 : तिथि और मुहूर्त:

कृष्ण जनमाष्टमी भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।

अष्टमी तिथि-2 सितंबर 2018 को शाम 20:47 ( शाम 08:47) बजे के बाद अष्टमी तिथि शुरु होगी।

3 सितंबर 2018 को शाम 19:20 (07:20) पर अष्टमी तिथि खत्म हो जायेगी।

निशित पूजा मुहूर्त:  निशित पूजा मुहूर्त रात्रि 23:58 से 24:44 ( रात्रि 11:58 से 12:44) बजे तक है।

भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव 3 सितंबर की रात को  मनाया जाएगा क्योंकि अष्टमी तिथि का सूर्योदय 3 सितंबर को होगा। व्रत का परायण 3 सितंबर को  रात्रि 8:00 बजे के बाद होगा क्योकि रात्रि 8:00 बजे तक ही रोहिणी नक्षत्र रहेगा । इस बार की जनमाष्टमी भगवान श्री कृष्ण की 5245वीं जयंती हैं ।

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हैप्पी जन्माष्टमी 


श्री कृष्ण जन्म कथा:

मथुरा नगरी का राजा कंस बहुत ही अत्याचारी था। उसकी बहन देवकी का विवाह वासुदेव से होता है। विवाह के पश्चात एक आकाशवाणी होती है जिसके अनुसार देवकी और वासुदेव का आठवां पुत्र कंस की मृत्यु का कारण बनेगा । यह आकाशवाणी सुनकर कंस अत्यधिक भयभीत हो जाता है और अपनी बहन देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद करवा देता है ।धीरे-धीरे करके वह देवकी के सात पुत्रों की हत्या कर देता है।
भगवान श्री कृष्ण देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र के रुप में जन्म लेते है।श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था।उनके जन्म के तुरंत बाद आकाशवाणी द्वारा वासुदेव को यह आदेश दिया जाता है कि वे श्री कृष्ण को गोकुल में यशोदा माता और नंद बाबा के वहां पहुंचा दे ताकि वे वहां  पर कंस से सुरक्षित रह सके । श्री कृष्ण का लालन -पालन और देखभाल माता यशोदा और नंदबाबा की देखरेख में संपन्न होता है। तभी से ही  भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिवस को जनमाष्टमी के रुप में मनाया जाता है।


जनमाष्टमी की तैयारियाँ:

श्री कृष्ण जन्माष्टमी को भक्तगण  पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं ।कई भक्त जन्माष्टमी के पूरे दिन तक व्रत रखते हैं और रात्रि 12:00 बजे भगवान के जन्म के पश्चात उनकी पूजा अर्चना करके अपने व्रत का परायण करते हैं। जन्माष्टमी के लिए सभी मंदिरों में खास तैयारियाँ की जाती है। भगवान श्री कृष्ण के बाल रुप अर्थात बालगोपाल को झूले में बैठा कर उन्हें झुलाया जाता है। इस पर्व पर भगवान के जन्मस्थल मथुरा के मंदिर की सजावट और तैयारी तो देखते ही बनती है। वहां रात्रि 12:00 बजे श्री कृष्ण के जन्म के पश्चात उनके  बालरुप की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। यह पर्व भक्तगण पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते है।

दही-हांडी प्रतियोगिता:

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दही हांडी 

जनमाष्टमी के  उपलक्ष्य में देश के कई शहरों में दही-हांडी प्रतियोगिता का आयोजन होता है।इस प्रतियोगिता में युवक-युवतियाँ  बाल गोविंदा बनकर, छाछं- दही आदि से भरी हुई मटकी को फोड़ते है।यह मटकियाँ काफी ऊँचाई पर लटका दी जाती है।इसे फोड़ने वाले विजेता टीम को उचित  इनाम देकर प्रोत्साहित किया जाता है।

पूर्णावतार श्रीकृष्ण:

भगवान के चौबीस अवतारों में दो पूर्णवातार अहम है।ये  हैं मर्यादा पुरुषोत्तम राम और अच्युत श्रीकृष्ण। राम ने जहाँ मानव को मर्यादापूर्ण जीवन कैसा हो इसका पाठ पढ़ाया तो वही श्रीकृष्ण ने जीवन -धर्म को कैसे सुलभ और सुंदर बनाया जाए इसका ज्ञान दिया।योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्म, भक्ति और योग के समुचित सामंजस्य से जीवन के मार्ग को सुलभ बनाने का मार्ग दिखाया।
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जय श्री कृष्णा 


स्थितिप्रज्ञ श्रीकृष्ण:

श्रीकृष्ण ने गीता में स्थितिप्रज्ञता का ज्ञान दिया ।अर्थात  अपनी स्थिति के अनुसार समुचित निर्णय लिया जाना चाहिए। उन्होंने अपने कर्मों द्वारा इसे चरितार्थ भी किया। तीनों लोको के मालिक ने समयानुकूल ना तो द्रौपदी की चरणपादुका उठाने में कोई संकोच किया और ना ही भरी सभा में शिशुपाल को चक्र से शिरोच्छेद करने में। परिस्थिति प्रतिकूल देखकर जरासंध से युद्ध के समय  युद्ध को छोड़कर उन्होंने 'रणछोड़' नाम से अपना परिचय दिया। अर्थात उन्होंने ऐसी निष्काम कर्म की संकल्पना दी जिससे कोई पृथक नहीं हो सकता।
भगवान श्रीकृष्ण के पूरे जीवन काल  में हमें उनके व्यक्तित्व के अनगिनत आयाम देखने मिलते हैं। कभी बाललीला करते श्रीकृष्ण तो कभी राक्षसों का वध करते श्रीकृष्ण,कभी बंशी बजाते श्रीकृष्ण तो कभी रासलीला रचाते श्रीकृष्ण,कभी गीता का उपदेश देते योगेश्वर श्रीकृष्ण तो कभी द्रौपदी की लाज बचाते श्रीकृष्ण। अर्थात हर परिस्थिति में, हर रूप में ,कृष्ण हमें पूर्ण दिखाए देते हैं । इसीलिए तो भक्त उन्हें पूर्णावतार भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ।

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