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Sukh aur dukh kya hai?

सुख- दुःख  मे क्या अंतर है ?


सुख - दुःख  एक दूसरे के विपरीत (opposite) शब्द है। एक के अनुभूति दूसरे से गहरी  जुडी  हैं ।अर्थात दोनों ही परस्पर Interdependent है । दूसरे शब्दों में, सुख  की  सुखता  की अनुभूति तभी होती है जब हम दुख को भोग चूके होते हैं । अतः मानव जीवन के लिए समुचित मात्रा में दोनों ही आवश्यक हैं।
सरल शब्दों में कहा जाए तो अपने अनुकूल इच्छा की पूर्ति  सुख है तो वही उसकी अनापूर्ति दुख । सामान्यतः कोई भी मनुष्य दुख नहीं चाहता अपितु वह सदा सुखी रहना  चाहता है । इसके लिए  वह निरंतर  प्रयास भी करता रहता है।
दरअसल ,सुख-दुख एक अनुभूति है जो व्यक्ति, वस्तु एवं समय के सापेक्ष होता है ।कोई किसी घटना से सुखी होता है तो दूसरा उससे दुखी । वस्तुतः सुख या दुख की निरंतरता नहीं होती ,यह प्रतिपल बदलती है । बहुत सारे लोग" क्षणे तुष्टा, क्षणे रूष्टा" वाले होते हैं जो तुरंत ही सुखी और अगले पल दुखी हो जाते हैं। यह पूर्णतः  व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं उसकी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

हम दुखी कब होते है ?


आध्यात्मिक स्तर पर गीता हमें पढ़ाती है कि हम मुख्यतया  तीन कारणों से दुखी होते हैं।

1) अभाव -किसी भी चीज की कमी हमें दुख पहुंचाती है ।मसलन धन, पद, प्रतिष्ठा व  अमुक खास चीज की कमी  जिसे हम दिल से चाहते हैं।


2) व्याधि- शारीरिक रोग हमें दुख पहुंचाती है।

3) उपाधि -अर्थात जो हमें प्राप्त है, जैसे पुत्र तो है किंतु लायक नहीं है, पद तो है किंतु उपभोग नहीं की जा सकती आदि ।

सुख कैसे प्राप्त करें?

1.ऊपर लिखित कार्यो का निरोध ही सुख है। अगर अपने जीवन के अभाव को हम परिश्रम से पूरा करें और शेष बचे अभावों को देवेच्छा या फिर दर्शनात्मक समाधान दे सके तो हम सुखी हो सकते है।

2 इसी प्रकार अपने खान-पान ,आहार- विहार, योग -ध्यान को अपने प्रतिदिन की  दिनचर्या  में शामिल करें तो व्याधि से बचकर  हम सुखी रह सकते हैं।

3. समयानुकूल निर्णय और अनुशासन में रहकर समुचित प्रयास से  उपलब्ध  संसाधनों द्वारा  सुख की प्राप्ति की जा सकती है।

वस्तुतः सुख की उपस्थिति तभी संभव है जब मन से विषाद दूर रहे। यह  जरुरी नहीं है कि अधिक धन व सुविधाएँ हमें सुख प्रदान करें ।जीवन के भौतिक सुख सुविधाओं का  त्याग करने वाले संतो के आगे हम झुकते हैं ।यह बात साबित करता है कि वस्तुए एवं सुविधाएँ सुख  प्राप्ति के लिए अनिवार्य नहीं हैं ।अपितु त्याग और बलिदान की भावना भी हमें उतनी ही सुख प्रदान करती है।

दरअसल, हमारी इच्छाएँ और उसे प्राप्त करने के लिए अपनाए जाने वाले साधन ही हमें अंततः सुख -दुख के परिणाम के रुप में प्राप्त होते हैं। गलत तरीके से संचित किए गए धन दुखदाई होते हैं ठीक उसी प्रकार छल प्रपंच से ग्रहण करने वाला ज्ञान भी निरर्थक साबित होता है। कर्ण द्वारा परशुराम से प्राप्त  शिक्षा असत्य पर आधारित थी अतः अंत में यह कर्ण के काम नहीं आया।

अतः संपूर्ण मानव बनने के लिए अपने जीवन में सुख दुख का पर्याप्त अनुभव आवश्यक है। प्रसिद्ध कवि पंत जी ने कहा है कि-
 "  मैं   नहीं   चाहता चिर- सुख,
    मैं  नहीं  चाहता  चिर- दुख,
    सुख- दुख के मधुर मिलन से,
    यह  जीवन   हो   परिपूर्ण" ।




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