Header Ads

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत : Sankasti Ganesh Chathurti vrat in Hindi

संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व :

वक्रतुण्ड  महाकायं  सूर्य  कोटि  समप्रभा
निर्विघ्नं   कुरुमेदेवं सर्व  कार्येषु  सर्वदा  

प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश को बल और बुद्धि का देवता कहां जाता है। वे अपने भक्तों के सभी कष्ट सभी दुख और सभी विघ्नो को हर लेते हैं, इसीलिए उन्हें विघ्नहर्ता भी कहां जाता है। संकट से मुक्ति मिलने को संकष्टी कहते हैं और संकष्टी चतुर्थी का अर्थ है संकट को हरने वाली चतुर्थी।
संकष्टी चतुर्थी का व्रत भक्त  संकट को हरने वाले प्रभु श्री गणेश को प्रसन्न कर उनकी कृपा दृष्टि पाने के लिए करते हैं। इस दिन गौरी पुत्र श्री गणेश जी के लिए भक्त पूरे दिन अर्थात सूर्योदय से चन्द्रोदय तक कठिन वत उपवास करते हैं ।ऐसा माना जाता है संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से सभी  तरह  के विघ्न और बाधाओं से  मुक्ति मिलती है, घर में सुख शांति हमेशा बनी रहती हैं।

कब मनाते है संकष्टी चतुर्थी व्रत:


संकष्टी चतुर्थी हर महीने में दो बार मनाई जाती है। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण  पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी, विनायक चतुर्थी के  नाम से जाना जाता है ।अगर संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है  तो इसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं । इसे बहुत ही शुभ माना जाता है। दक्षिणी और पश्चिमी भारत में , खासकर महाराष्ट्र और तमिलनाडु में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है ।महाराष्ट्र में इसे संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है वही तमिलनाडु में इसे गणेश संकटहरा या संकटहरा चतुर्थी के नाम  से जाना जाता है।
माघ महीने की पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी बहुत शुभ मानी जाती है। उत्तरी भारत में माघ माह के दौरान पढ़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को संकट चौथ के नाम से जाना जाता है और भाद्रपद माह के दौरान पडने वाली विनायक चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी सभी  जगह भगवान गणेश के जन्मदिन के रुप में मनाया जाता है। भाद्रपद माह के गणेश चतुर्थी को बहुला चौथ के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी पढ़े :बारह ज्योर्तिलिगं मंत्र  भगवान शिव के| Twelve jyotirlinga of Lord Shiva

संकष्टी चतुर्थी व्रत के नियम :


संकष्टी चतुर्थी के लिए उपवास का दिन चन्द्रोदय के समय से निर्धारित किया जाता है। जिस दिन  संकष्टी चतुर्थी  के दौरान चन्द्र उदय होता है उस दिन ही संकष्टी का व्रत रखा जाता है।
संकष्टी  चतुर्थी का  उपवास थोड़ा कठोर होता  है ।इसमें भक्त पूरे दिन केवल पानी, दूध , फल, साबूदाने की खीर, मूंगफली और वनस्पति उत्पाद जैसे शकरकंद,आलू इत्यादि  ग्रहण करते हैं । शाम को चांद निकलने से फिर से स्नानादि करके पूरी विधि विधान के साथ श्री गणेश जी की पूजा उपासना  करते हैं ।पूजा के उपरांत चन्द्रमा के दर्शन करने के बाद उपवास को तोड़ते हैं।

यह भी पढ़े : गणेश चतुर्थी व्रत ,कथा और महत्व 


पूजा में ध्यान देने योग्य बातें :


1)  इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि  करके भगवान श्री गणेश जी की पूजा करें।
2)  पूरा दिन व्रत रखे। व्रत के दौरान पानी, फल ,दूध, साबूदाना आदि ग्रहण किया जा सकता है।
3)  पूरे दिन भगवान श्री गणेश का ध्यान करें। उनके  मंत्रों का जाप करें ।
4)  शाम को चांद निकलने से पहले  फिर से स्नानादि करके साफ कपड़े पहन कर भगवान श्री गणेश जी की पूजा अर्चना  करे । 
5)  गणेश जी के बगल मे दुर्गा जी की भी फोटो रखकर उनकी भी पूजा करे 
6)  पूजा में श्री गणेश को फल, फूल ,दूरवा ,मोदक ,लड्डु आदि प्रसाद के रूप में चढ़ाए।
7)  गणेश जी के मंत्र का जाप करें।
8)  पूजा के बाद संकष्ट चतुर्थी की कथा जरूर सुने।
9)  पूरी श्रद्धा  से गणेश जी की आरती करे।
10)  पूजा के बाद प्रसाद वहां उपस्थित लोगों में वितरित करें ।
11) पूजा के बाद चन्द्रदर्शन करके अपना उपवास तोड़े ।

   आइए,हम सभी भक्तजन  भगवान श्री गणेश  को इस मंत्र का उच्चारण करते हुए  प्रणाम करे।

गजाननं   भूतगणादि     सेवितम  ।
कपित्थ  जम्बूफल   चारू भक्षणम ।
उमासुतं    शोक    विनाशकारकम  ।
नमामि  विघ्नेशवर  पादपकंजम  ।।


No comments