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कामाख्या देवी मंदिर : अद्भुत और रहस्यमयी Kamakhya Devi Temple:Unique And Mysterious



कामाख्या देवी मंदिर : अद्भुत और रहस्यमयी 


भारत देश में अनेको ऐसे मंदिर स्थित है जिनसे लोग अपने भक्ति, साधना, आस्था और विश्वास के साथ जुड़े
 हैं । इन मंदिरों के अलावा यहाँ कुछ मंदिर ऐसे भी है जहां विस्मयकारी चमत्कार होते रहते हैं । आस्थावान और भक्तों के लिए जहाँ ये चमत्कार  देवी कृपा है वही  अन्य लोग इसे कुतुहल और आश्चर्य का विषय  मानते हैं। कामाख्या मंदिर ऐसे ही चमत्कारों और रहस्यों से भरा हुआ एक मंदिर है । तो आइए  नीचे दिये गये विडियो के माध्यम से जानते है , कामाख्या मंदिर के १५ अनोखे और अद्भुत रहरस्यों के बारे में।







कामाख्या मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से 8 किलोमीटर दूर कामाख्या में है। कामाख्या से भी 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर यह मंदिर स्थित है। यह मंदिर देवी सती का मंदिर है तथा 51 शक्ति पीठ में सबसे  महत्वपूर्ण है। प्राचीनकाल  से ही यह मंदिर तंत्र सिद्धि का  सर्वोच्च स्थल माना जाता है । इस मंदिर में देवी सती या मां दुर्गा की कोई मूर्ति नहीं है। यह मंदिर महान शक्ति- साधना का केंद्र मानी जाती है। यहां हर किसी की कामना सिद्ध होती है इसी कारण इस मंदिर को कामख्या मंदिर कहा जाता है।

कामाख्या मंदिर से संबधित पौराणिक कथाः


एक प्रचलित कथा के अनुसार देवी सती का भगवान शिव से विवाह करना उनके पिता राजा दक्ष को पसंद नही था। एक बार  राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया और सभी देवीं-देवताओं को उस यज्ञ में आने का  निमंत्रण भेजा। जब माता सती को इस बात का पता चला तो वे बिना बुलाए ही अपने पिता के घर पहुँच गई।इस बात पर राजा दक्ष ने माता सती का बहुत अपमान किया ओर उनके पति महादेव के लिये भी अपमानित शब्दों का प्रयोग किया।पति का अपमान जब माता सती  से सहन नही हुआ तो  वे  वही यज्ञ के हवन कुड में कूद गई।
इस बात का पता जब भगवान शिव को चला तो वे अत्यंन्त क्रोधित  हो गए और राजा दक्ष के यज्ञ  में पहुंचकर माता सती का शव लेकर क्रोधाग्नि में जलते हुए तांडव करने लगे ।भगवान शिव का क्रोध कम करने के लिए तब भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया । इस चक्र के प्रयोग से माता सती का शव 51 हिस्सों में बँटकर धरती  पर अलग-अलग स्थानों पर जाकर गिरा। माता सती की योनि और गर्भ नीलांचल पर्वत पर गिरा। यहीं पर 17 वीं  सदी में बिहार के  राजा नारायण ने कामख्या मंदिर का निर्माण कराया ।

प्रचलित मान्यता :

यहां प्रचालित एक मान्यता के अनुसार कामाख्या मंदिर में माता आघ-शक्ति  महाभैरवी  के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद के दर्शन करना आवश्यक है । महाभैरव उमानंद का मंदिर ब्रहमपुत्र नदी के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। यही पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण चला कर आहत किया था और  समाधि से जागृत  होने पर सदाशिव ने यही पर उन्हें भस्म कर दिया था । नीलाचंल पर्वत पर ही कामदेव को पुनः जीवनदान मिला था। इसलिए इस क्षेत्र को कामरुप भी  कहा जाता है।

अम्बूवाची पर्व :

यहाँ पर तीन दिनों के लिए होने वाला 'अम्बूवाची पर्व ' विशेष महत्व रखता है। यह पर्व सभी तंत्र -मंत्र में रुचि रखने वाले साधकों के लिए कुंभ महापर्व की तरह होता है। हस पर्वं  पर भारत के बाहर से भी तंत्र  साधक यहाँ पहुंचते हैं। अम्बबूवाची पर्व के दौरान मां भगवती रजस्वला होती है और 3 दिनों तक महामुद्रा (योनि -तीर्थ) से निरंतर ( जल -प्रवाह) के स्थान पर रक्त प्रवाहित होता है। यह एक विलक्षण नजारा होता है।
इस पर्व पर विश्व भर के तांत्रिको -मांत्रिको ,अघोरियों का जमावडा यहां लगता है। तीन दिन के उपंरात भगवती की रजस्वला समाप्ति होने पर उनकी विशेष पूजा -अर्चना एवं साधना की जाती है।
सचमुच,माता आघ शक्ति का यह मंदिर अदभुत,अलौकिक एवं अनोखा है।





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