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स्वयं ( अपने आप ) को कैसे पहचाने ?

स्वयं  को  पहचानना  है बहुत  आसान :


हम  में  से  बहुत से  लोग  अधिकतर  समय  ये  जरूर सोचते है की  हम  अपने  घर - परिवार , अपने  सगे- संबधियों  को  अच्छी तरह पहचानते  है, उन्हें अच्छी  तरह  समझते  है, या फिर उन्हें  धीरे- धीरे पहचानने  की  कोशिश  कर  रहे  है।   दुसरों  को  पहचानने  के  बारे  मे  तो  हम  हमेशा  सोचते  है  लेकिन क्या कभी हमने ऐसा  अपने  बारे  मे  सोचा  है । कभी  हम  स्वयं  को  पहचनाने  की  कोशिश  करते  है  क्या ?
खुद  को पहचानना  दरअसल सभी  समस्याओं का समाधान देता है । ईश्वर ने हमे तमाम संभावनाओं से युक्त  किया है ।और हम  हर वो  काम कर  सकते है जो हमसे पहले  के सफल  लोगो  ने किया है या फिर जो अभी तक नहीं हुआ है। अर्थात  हम  मे  असीम संभावनाएँ  है । हमें बस  एक  सकारात्मक पहल करने  की ज़रूरत भर है ।
पर  इतनी  सी  बात  से  हम  सब  कुछ  नहीं  पा  सकते  है । क्योंकि  संभावनाओ  का  होना  एक  बात है  और उसे  मूर्त  रूप  देना  दूसरी  बात । दूसरे  शब्दों  मे जिसे 'संभव ' और 'असंभव ' के  मानको  से  आँका जा सकता है ।
तो  एक  बात  हम  तय  माने  की  हमारे  लिए कुछ  भी  असंभव  नहीं  है और  उस  असंभव  को  संभव  करने के लिए  सार्थक  प्रयास  की  आवश्यकता  होती  है ।यह  सार्थक  प्रयास  तभी  संभव  है  जब  हम  उन  संसाधनों  को  जाने  जो  हमारे  पास  है  या  फिर  जिसे  इकट्ठा  करनी है ।
खुद  के  पास  के  संसाधनों  को  जानने  के  लिए आत्मचिंतन  की  आवश्यकता  होती  है ।अपनी  मौजूदा सीमाओ  को  आँका जाता  है और  तदनुकूल  योजना  बनाकर  उसे  कार्यान्वित  करने  से  सौ-प्रतिशत  सफलता हासिल  हो  जाती  है ।
अतः  यदि  हम अपनी- अपनी  क्षमताओं  के  अनुरूप  उपलब्ध  संसाधनों से  अपने  लक्ष्य - प्राप्ति  का  प्रयास करे  तो  सफलता  निश्चित  हाथ  लगेगी । इसमें  संदेह  की  तनिक  भी  गुंजाइश  नहीं  है ।

   करे  परमपिता  परमेश्वर  का  धन्यवाद :


जब  हम  अपने  को  जानने  की  बात  करते  है  तो  उस  परमेश्वर  को  आभार  प्रदान  करने  को कहते  है  जिसने  हमे  मनुष्य  का  तन  और  मन  दिया  और  चौरासी  लाख  प्राणियों  मे  सर्वश्रेष्ठ  बनाया ।हमे अपने  आतंरिक  संसाधनों का  समुचित  उपभोग  कर  संसार के  संसाधनों  का  अधिकतम  उपभोग  करना है ,और  अपनी  स्व-चेतना  से  दूसरो  के  अन्दर की  सकारात्मक  सोच  को  भी  सही  दिशा  देना  है ।
बाह्य  जगत  की  तरह  हमारे  अन्तर्मन  मे  भी  बंधू-  बांधव  और  मित्र - शत्रु  मौजूद  है । सकारात्मक  सोच, अपने  ऊपर  विश्वास ,प्रेम , निष्ठा  आदि  हमारे  मित्र  है  तो  काम , क्रोध  , लोभ  जैसे  मनोविकार  हमारे  शत्रु। हमे  शत्रुओं  का  सम्यक  उपयोग  कर उसे  अपने  लक्ष्य  प्राप्त करने  मे  सहायक  बनाना  होता  है  न  की  उसके  अधीन हो  जाना ।
स्वयं  को  पहचानना  हमारे  लिए  अति  आवश्यक  है  क्योंकि  जब  हम  स्वयं  को  पहचानेंगे  तभी  तो  अपने  मन  की  गहराईयों  मे  छिपी  हुई  बातोँ  को  भी  समझेंगे । जब  भी  हम  कुछ  नया  करते  है  या  फिर  करने  की  सोचते  है  तो  हमारा  अन्तर्मन  हमे  संकेत  करता  है  की  जो  हम  कर  रहे  है  या  फिर  करने  जा  रहे  है वो  सही  है  या  गलत । लेकिन  अपने  अन्तर्मन  की  बात  को  वही  इंसान  समझ  सकता  है  जिसने  स्वयं  को  पहचाना  है । इसलिए , दोस्तों ! स्वयं  को  पहचानने  का  प्रयास  कीजिये , इससे  जीवन  की  हर  मुश्किल  को  पार  करना  आपके  लिए  बहुत  आसान  हो  जायेगा  और  आप निरंतर  सफ़लताओ  को  पाते  हुए  आगे  बढ़ते  चले  जाएंगे ।





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